Friday, September 16, 2011

यादें

आज कुछ देर यादों का सहारा लें
कुछ सोच की खुशबुओं का लुत्फ़ लें
उन भूली यादों को आते रहने दीजिये
उनको फिर से हँसाने रुलाने दीजिये


                    यादें माँ की कोख की गर्माइश की
          जीना जाना जहाँ तंग अँधेरे में सिमट कर
          यादें उस पहली प्यास की
          जो बुझाई थी माँ के कलेजे से चिमट कर
          यादें गिरने और संभलने की
          चलना सीखे जब बाप की ऊँगली पकड़ कर

यादें वोह पैर में लगे बेरी के कांटो की
जिन्हें निकाला करते थे गर्म सुई चुभो कर
यादें साइकल सीखते हुए गिरने की
जब जख्मी घुटने को सहेजा था छुप छुप कर
यादें शीशे के सामने घंटों बाल बनाने की
जब कोई टोक दे तो भाग जाना चिढ़ कर

       यादें सड़कों पर टहलती बालाओं को चोरी से ताकने की
       और मौका देख कर लेडीज़ स्टाफ रूम में झाँकने की
       यादें फटी नेकर को कमीज़ निकाल कर ढांपने की
       छुट्टी की घंटी सुन सड़क तक दौड़ के हाम्पने की
       यादें दूसरों के टिफिन से खाना चुरा कर खाने की
       इम्तिहानों में पर्चियों बना कर टीपने टिपाने की

यादें उन आंसुओं की जब पहली बार घर छोड़ा था
नौकरी की धुन में शहर मोहल्ले से मुख मोड़ा था 
यादें तन्हाई में छत पर लेट कर बिताई रातों की
नए दोस्तों से बनते बिगड़ते रिश्ते नातों की
यादें उन जले हाथों पर पढ़े टीसते हुए छालों की
जली रोटी की और तरकारी में पड़े कच्चे मसालों की


            यादें उस दिन की जब पहली बार उसको देखा था
     जिसके ही साथ जीवन बिताने का लेखा था
     यादें अस्पताल के बरामदे में बेसब्री और बेकरारी की
     नम आँखों के साथ सुनी बेटे की प्रथम किलकारी की
     यादें उस एहसास की जब सर नतमस्तक हुआ था
     मातृत्व क्षमता के समक्ष मरदाना गुरूर निरर्थक हुआ था


भूत भविष्य वर्तमान का सफ़र जारी है
पर अब हमारे चुप हो जाने की बारी है 
यादें अभी और भी बनती चली जाएँगी
कुछ नयी बातें होंगी तो कुछ फिर दोहराएंगी
अपने दामन में यादों को समेटते चले जायेंगे
फिर कभी मिले तो ज़रूर आपको भी सुनायेंगे

Saturday, January 1, 2011

२०११ की प्रथम कृति

सब्र के फल की मिठास चखने को सब्र नहीं
हम बेसब्रों को यारों आते हुए पल की फिक्र नहीं ||
 
क्यूँ रखूँ बीते दिनों के एहसासों के हिसाब
उनको याद करके क्यूं करून मेरा आज ख़राब ||
 
जिंदगी तो बस आज, अब और अभी होती है
कल के इंतज़ार में तो अता बस कब्र होती है ||

Wednesday, October 27, 2010

यह कहाँ आ गए हम

पैसे और सत्ता को मान लिया निधि
समय हो गया बेमानी
हमने तो बस तिजोरियों
की आबादी बड़ाने की ठानी
संवेदनाओं की कद्र कतई है फ़िज़ूल
आंसू, हंसी, प्यार, इज्ज़त
की भाषा तक गए भूल

समय में और हममें
दौड़ शुरू हुई थी
जीत हार का तो पता नहीं
पर समय पिछड़ता सा दीखता है
ठिठक गया है बिचारा,
हम भागे चले जाते हैं

रुका पल जब याद बन जाता है
तभी वोह हमको भाता है

Friday, August 20, 2010

एक प्रश्न विधाता से - ऐसा क्यूँ ?


मृत्यु के आकार की कल्पना
हर व्यक्ति के लिए अबूझ पहेली है
पर उसके प्रकार का सामना
रोज़ सुबह की खबर पहली है

लेह, रूस, चीन हो या पाकिस्तान
विपदाओं से जूझ रहा इन्सान
विचार आता है की क्यूँ हर जगह
केवल गरीबों की लाशों के हैं कब्रिस्तान

जिन्हें बाढ़, सूखे और भूकंप में बिलखते देखते हैं
उनकी आँख में आंसू और कपड़ो पर पेबंद होते हैं
शायद ऊपर वाले को इन गरीबों की है ज्यादा ज़रुरत
या उसे भी मुंह लग गयी अमीरों के चडावे की रिश्वत

Sunday, February 21, 2010

मेरे दोस्त [गीत - हसरत जयपुरी]



एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों 

बनता है मेरा काम तुम्हारे ही काम से
होता है मेरा नाम तुम्हारे ही नाम से
तुम जैसे मेहरबां का सहारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

जब पडा है कोई भी मुश्किल का रास्ता
मैंने दिया है तुम को मुहब्बत का वास्ता
हर हाल में तुम्हीं को पुकारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

यारों ने मेरे वास्ते क्या कुछ नहीं किया
सौ बार शुक्रिया अरे सौ बार शुक्रिया
बचपन तुम्हारे साथ गुज़ारा है दोस्तो
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

Wednesday, February 10, 2010

"संगीत सज्जनता का" (सर्वश्री पंडित जसराज जी को समर्पित)


धुन छेड़ने को खुद

उंगलियों पे ज़ख्म बनाये
सरगम वही थी
पर खोज कर नए सुर लगाये

उसके छालों से
लेकिन दुआएं ही आती हैं  
जब सब दौड़ते
हैं खुद के लिए
उसकी नयी राहें नक़्शे बनाती हैं 

दिल की तड़प होठों पर जब आती है,
जाड़ों में तपन का अहसास दिलाती है,
आगे चलने से कुछ नहीं होता है,
अच्छे बनने से भीड़ पीछे आती है



Thursday, February 4, 2010

फुर्सत





 
“एक तोहफा मिलता है हर रोज़ भगवान् से
बिना किसी भेदभाव के निर्धन या धनवान से


         २४ घंटे का समय है उस तोहफे का नाम


         फुर्सत मिल ही जाती है सुबह, दोपहर या शाम




देश हो या विदेश हमने तो ठाना है


मित्रों की बातों को छंदों में सुनाना है”





Thursday, January 28, 2010

पनिहारिन




पनिहारिन चल पड़ी डगर डगर
दूर कहीं है उसका छोटा सा कच्चा घर
खेत, खलिहान, रास्ते रोज़ के हमसफ़र
खुद आंसू पीती, पसीना बहाती है
पैरों के छालों को भूल
औरों की प्यास बुझाती है
देश कोई हो, विडंबना पुरानी है
यही हर अबला की कहानी है

Wednesday, January 6, 2010

यादें



बचपन से लड़कपन तक का वोह समय जब माँ सिगड़ी पर फुल्के बनाती जाती थी और हम सब सलीके से अपनी अपनी जगह पर उनके चारों तरफ बैठ कर अपने फुल्के का इंतज़ार करते और बीच बीच में चुहल होती और कभी फुल्के के लिए खींचतान | पर जब भी पिताजी की थाली खाली होती तो फुल्का पहले वहीँ परोसा जाता और वह यह देख कर की हममे से कोई इंतज़ार कर रहा है वह आधी रोटी तोड़ कर उसे देते माँ फटकारती, “अरे, उसकी रोटी आ रही है आप लीजिये” पर पिताजी कहते “अब ठीक है ना क्यों बिगडती हो अन्नपुर्णा” | तब समझ नहीं आता था किन्तु अब इस व्यस्तता में जब की घर आने के समय भी अलग अलग हैं और माइक्रो ओवेन और रेफ्रिजेरटर का ज़माना है तो वह सब बातें स्वप्न सरीकी लगती हैं |

Monday, November 30, 2009

Historical Event - Durban World Cup Stadium Opens


The breathtaking experience to be part of history. Mabhida Moses Stadium, Durban's latest and probably the Top Iconic structure opened on 29th Nov. With total capacity of more than 50,000 only 22,000 seats in lower tires were allowed access and it was a sold out. The local FC Zulu team played with Maritzburg United. The atmosphere was electric with the typical blow horns (VUVUZELAS) making tremendous sound which reached about 1 KM in the surroundings outside the stadium. Lucky to witness the event.




Tuesday, November 17, 2009

उजाले फतह हो चुके

पर्दों को हटा के खिड़की के रास्ते, सागर पर उड़ते परिंदों को देखा

रिश्ते मिटा के जीवन के वास्ते, दुनिया में लड़ते बन्दों को देखा

जीवन का यही सफ़र है, कोशिश एक डगर है

जंगल हो या रेगिस्तान, जहाँ बस जाओ वही नगर है

आसमानों की चाहत की किसीने तभी तो उड़ने की हिम्मत जगी होगी

गिरने की परवाह नहीं की उसने, तभी तो चाँद पर पृथ्वी उगी होगी

सवेरे के लिए सूरज की कमी क्यूँ महसूस हो ?

खुदी के दम पर जहाँ रौशनी महफूज़ हो

रौशनी मोहताज़ कभी रही होगी आफताब की

अब तो उजाले फतह हो चुके, बातें नहीं यह अब ख्वाब की

नींव जो जन्चवाई अभी बने ऊँचे मकानों की

टटोली जो नब्ज़ बदलते ज़मानों की

रंग ढंग रूप रंग सबकुछ निखरता सा लगा

समुद्री हवाओं का रुख सुधरता सा लगा

लड़ने वाले पिटेंगे लुटेंगे पर आगे बढ़ेंगे

पंछी थकें भी तो क्या और भी ऊंची उड़ाने भरेंगे

खिड़कीयों के परदे सरकने दीजिये

आँखों को नज़ारे देखने दीजिये

Friday, September 16, 2011

यादें

आज कुछ देर यादों का सहारा लें
कुछ सोच की खुशबुओं का लुत्फ़ लें
उन भूली यादों को आते रहने दीजिये
उनको फिर से हँसाने रुलाने दीजिये


                    यादें माँ की कोख की गर्माइश की
          जीना जाना जहाँ तंग अँधेरे में सिमट कर
          यादें उस पहली प्यास की
          जो बुझाई थी माँ के कलेजे से चिमट कर
          यादें गिरने और संभलने की
          चलना सीखे जब बाप की ऊँगली पकड़ कर

यादें वोह पैर में लगे बेरी के कांटो की
जिन्हें निकाला करते थे गर्म सुई चुभो कर
यादें साइकल सीखते हुए गिरने की
जब जख्मी घुटने को सहेजा था छुप छुप कर
यादें शीशे के सामने घंटों बाल बनाने की
जब कोई टोक दे तो भाग जाना चिढ़ कर

       यादें सड़कों पर टहलती बालाओं को चोरी से ताकने की
       और मौका देख कर लेडीज़ स्टाफ रूम में झाँकने की
       यादें फटी नेकर को कमीज़ निकाल कर ढांपने की
       छुट्टी की घंटी सुन सड़क तक दौड़ के हाम्पने की
       यादें दूसरों के टिफिन से खाना चुरा कर खाने की
       इम्तिहानों में पर्चियों बना कर टीपने टिपाने की

यादें उन आंसुओं की जब पहली बार घर छोड़ा था
नौकरी की धुन में शहर मोहल्ले से मुख मोड़ा था 
यादें तन्हाई में छत पर लेट कर बिताई रातों की
नए दोस्तों से बनते बिगड़ते रिश्ते नातों की
यादें उन जले हाथों पर पढ़े टीसते हुए छालों की
जली रोटी की और तरकारी में पड़े कच्चे मसालों की


            यादें उस दिन की जब पहली बार उसको देखा था
     जिसके ही साथ जीवन बिताने का लेखा था
     यादें अस्पताल के बरामदे में बेसब्री और बेकरारी की
     नम आँखों के साथ सुनी बेटे की प्रथम किलकारी की
     यादें उस एहसास की जब सर नतमस्तक हुआ था
     मातृत्व क्षमता के समक्ष मरदाना गुरूर निरर्थक हुआ था


भूत भविष्य वर्तमान का सफ़र जारी है
पर अब हमारे चुप हो जाने की बारी है 
यादें अभी और भी बनती चली जाएँगी
कुछ नयी बातें होंगी तो कुछ फिर दोहराएंगी
अपने दामन में यादों को समेटते चले जायेंगे
फिर कभी मिले तो ज़रूर आपको भी सुनायेंगे

Saturday, January 1, 2011

२०११ की प्रथम कृति

सब्र के फल की मिठास चखने को सब्र नहीं
हम बेसब्रों को यारों आते हुए पल की फिक्र नहीं ||
 
क्यूँ रखूँ बीते दिनों के एहसासों के हिसाब
उनको याद करके क्यूं करून मेरा आज ख़राब ||
 
जिंदगी तो बस आज, अब और अभी होती है
कल के इंतज़ार में तो अता बस कब्र होती है ||

Wednesday, October 27, 2010

यह कहाँ आ गए हम

पैसे और सत्ता को मान लिया निधि
समय हो गया बेमानी
हमने तो बस तिजोरियों
की आबादी बड़ाने की ठानी
संवेदनाओं की कद्र कतई है फ़िज़ूल
आंसू, हंसी, प्यार, इज्ज़त
की भाषा तक गए भूल

समय में और हममें
दौड़ शुरू हुई थी
जीत हार का तो पता नहीं
पर समय पिछड़ता सा दीखता है
ठिठक गया है बिचारा,
हम भागे चले जाते हैं

रुका पल जब याद बन जाता है
तभी वोह हमको भाता है

Friday, August 20, 2010

एक प्रश्न विधाता से - ऐसा क्यूँ ?


मृत्यु के आकार की कल्पना
हर व्यक्ति के लिए अबूझ पहेली है
पर उसके प्रकार का सामना
रोज़ सुबह की खबर पहली है

लेह, रूस, चीन हो या पाकिस्तान
विपदाओं से जूझ रहा इन्सान
विचार आता है की क्यूँ हर जगह
केवल गरीबों की लाशों के हैं कब्रिस्तान

जिन्हें बाढ़, सूखे और भूकंप में बिलखते देखते हैं
उनकी आँख में आंसू और कपड़ो पर पेबंद होते हैं
शायद ऊपर वाले को इन गरीबों की है ज्यादा ज़रुरत
या उसे भी मुंह लग गयी अमीरों के चडावे की रिश्वत

Sunday, February 21, 2010

मेरे दोस्त [गीत - हसरत जयपुरी]



एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों 

बनता है मेरा काम तुम्हारे ही काम से
होता है मेरा नाम तुम्हारे ही नाम से
तुम जैसे मेहरबां का सहारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

जब पडा है कोई भी मुश्किल का रास्ता
मैंने दिया है तुम को मुहब्बत का वास्ता
हर हाल में तुम्हीं को पुकारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

यारों ने मेरे वास्ते क्या कुछ नहीं किया
सौ बार शुक्रिया अरे सौ बार शुक्रिया
बचपन तुम्हारे साथ गुज़ारा है दोस्तो
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों

Wednesday, February 10, 2010

"संगीत सज्जनता का" (सर्वश्री पंडित जसराज जी को समर्पित)


धुन छेड़ने को खुद

उंगलियों पे ज़ख्म बनाये
सरगम वही थी
पर खोज कर नए सुर लगाये

उसके छालों से
लेकिन दुआएं ही आती हैं  
जब सब दौड़ते
हैं खुद के लिए
उसकी नयी राहें नक़्शे बनाती हैं 

दिल की तड़प होठों पर जब आती है,
जाड़ों में तपन का अहसास दिलाती है,
आगे चलने से कुछ नहीं होता है,
अच्छे बनने से भीड़ पीछे आती है



Thursday, February 4, 2010

फुर्सत





 
“एक तोहफा मिलता है हर रोज़ भगवान् से
बिना किसी भेदभाव के निर्धन या धनवान से


         २४ घंटे का समय है उस तोहफे का नाम


         फुर्सत मिल ही जाती है सुबह, दोपहर या शाम




देश हो या विदेश हमने तो ठाना है


मित्रों की बातों को छंदों में सुनाना है”





Thursday, January 28, 2010

पनिहारिन




पनिहारिन चल पड़ी डगर डगर
दूर कहीं है उसका छोटा सा कच्चा घर
खेत, खलिहान, रास्ते रोज़ के हमसफ़र
खुद आंसू पीती, पसीना बहाती है
पैरों के छालों को भूल
औरों की प्यास बुझाती है
देश कोई हो, विडंबना पुरानी है
यही हर अबला की कहानी है

Wednesday, January 6, 2010

यादें



बचपन से लड़कपन तक का वोह समय जब माँ सिगड़ी पर फुल्के बनाती जाती थी और हम सब सलीके से अपनी अपनी जगह पर उनके चारों तरफ बैठ कर अपने फुल्के का इंतज़ार करते और बीच बीच में चुहल होती और कभी फुल्के के लिए खींचतान | पर जब भी पिताजी की थाली खाली होती तो फुल्का पहले वहीँ परोसा जाता और वह यह देख कर की हममे से कोई इंतज़ार कर रहा है वह आधी रोटी तोड़ कर उसे देते माँ फटकारती, “अरे, उसकी रोटी आ रही है आप लीजिये” पर पिताजी कहते “अब ठीक है ना क्यों बिगडती हो अन्नपुर्णा” | तब समझ नहीं आता था किन्तु अब इस व्यस्तता में जब की घर आने के समय भी अलग अलग हैं और माइक्रो ओवेन और रेफ्रिजेरटर का ज़माना है तो वह सब बातें स्वप्न सरीकी लगती हैं |

Monday, November 30, 2009

Historical Event - Durban World Cup Stadium Opens


The breathtaking experience to be part of history. Mabhida Moses Stadium, Durban's latest and probably the Top Iconic structure opened on 29th Nov. With total capacity of more than 50,000 only 22,000 seats in lower tires were allowed access and it was a sold out. The local FC Zulu team played with Maritzburg United. The atmosphere was electric with the typical blow horns (VUVUZELAS) making tremendous sound which reached about 1 KM in the surroundings outside the stadium. Lucky to witness the event.




Tuesday, November 17, 2009

उजाले फतह हो चुके

पर्दों को हटा के खिड़की के रास्ते, सागर पर उड़ते परिंदों को देखा

रिश्ते मिटा के जीवन के वास्ते, दुनिया में लड़ते बन्दों को देखा

जीवन का यही सफ़र है, कोशिश एक डगर है

जंगल हो या रेगिस्तान, जहाँ बस जाओ वही नगर है

आसमानों की चाहत की किसीने तभी तो उड़ने की हिम्मत जगी होगी

गिरने की परवाह नहीं की उसने, तभी तो चाँद पर पृथ्वी उगी होगी

सवेरे के लिए सूरज की कमी क्यूँ महसूस हो ?

खुदी के दम पर जहाँ रौशनी महफूज़ हो

रौशनी मोहताज़ कभी रही होगी आफताब की

अब तो उजाले फतह हो चुके, बातें नहीं यह अब ख्वाब की

नींव जो जन्चवाई अभी बने ऊँचे मकानों की

टटोली जो नब्ज़ बदलते ज़मानों की

रंग ढंग रूप रंग सबकुछ निखरता सा लगा

समुद्री हवाओं का रुख सुधरता सा लगा

लड़ने वाले पिटेंगे लुटेंगे पर आगे बढ़ेंगे

पंछी थकें भी तो क्या और भी ऊंची उड़ाने भरेंगे

खिड़कीयों के परदे सरकने दीजिये

आँखों को नज़ारे देखने दीजिये